महिलाओं ने तैयार किए बैग, टोकरियां और सजावटी सामान; कॉफेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने प्रशिक्षकों एवं समन्वयक को किया सम्मानित
पटना। जलकुंभी को रोजगार का साधन बनाने और मछुआरा परिवारों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (कॉफेड) की पहल रंग लाती दिख रही है। मछुआरा समुदाय की महिलाओं एवं युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित 14 दिवसीय जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम शुक्रवार को संपन्न हो गया। इस दौरान महिलाओं ने जलकुंभी से कई उपयोगी एवं आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए। कार्यक्रम के समापन पर कॉफेड की ओर से प्रशिक्षकों और समन्वयक को सम्मानित किया गया।
कॉफेड की ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (अपशिष्ट से संपदा) पहल के तहत आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन 24 अक्टूबर को बिहार विधान परिषद के सदस्य एवं बिहार सरकार के पूर्व मंत्री श्री हरि सहनी ने नालंदा जिले के परवलपुर प्रखंड के हरप्रसाद बिगहा स्थित परवलपुर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति परिसर में किया था। कार्यक्रम को बर्ड, होप एवं आदार फाउंडेशन का सहयोग मिला। प्रशिक्षण में स्थानीय महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और जलकुंभी से हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। महिलाओं ने बैग, टोकरियां, चटाई, टेबल मैट, सजावटी सामान और अन्य उपयोगी वस्तुएं तैयार कीं। इन उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई गई, जो समारोह का प्रमुख आकर्षण रही।
प्रशिक्षकों और समन्वयक को किया सम्मानित
प्रशिक्षण के सफल समापन पर कॉफेड कार्यालय, पटना में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर कॉफेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने कार्यक्रम के समन्वयक नीलमाधब मंडल तथा मास्टर ट्रेनर नंदिता बागदी एवं बीना हाजरा को सम्मानित किया। उनके योगदान की सराहना करते हुए कॉफेड मखाना के विभिन्न उत्पाद उपहारस्वरूप भेंट किए। समारोह में समिति के मंत्री राजकुमार केवट भी मौजूद रहे। उन्होंने प्रशिक्षण के आयोजन और संचालन में सहयोग किया।
जलकुंभी बनेगी ग्रामीण रोजगार का माध्यम
इस अवसर पर ऋषिकेश कश्यप ने कहा कि जलकुंभी जलाशयों के लिए गंभीर समस्या है, लेकिन इसका उपयोग हस्तशिल्प उत्पाद बनाने में कर मछुआरा समुदाय के लिए आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। कॉफेड का प्रयास है कि जलकुंभी को उपयोगी उत्पादों में बदलकर मछुआरा परिवारों, विशेषकर महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जाए। प्रशिक्षण में महिलाओं की भागीदारी बताती है कि उचित अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर ग्रामीण महिलाएं उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं।
उन्होंने कहा कि जलकुंभी के अत्यधिक फैलाव से तालाबों, पोखरों, झीलों और अन्य जलाशयों में सूर्य का प्रकाश पानी के भीतर पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाता। इससे जलीय पारिस्थितिकी प्रभावित होती है और मत्स्यपालन, नौका संचालन तथा जलाशयों के प्रबंधन में कठिनाइयां आती हैं। ऐसे में जलकुंभी का हस्तशिल्प निर्माण में उपयोग पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का भी माध्यम बन सकता है।
कश्यप ने बताया कि कॉफेड भविष्य में इस प्रशिक्षण को अन्य मत्स्यजीवी सहकारी समितियों तक विस्तारित करने की दिशा में काम करेगा। साथ ही, महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों के विपणन और बाजार उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा। इससे ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने में मदद मिलेगी।
उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए श्री हरि सहनी के प्रति आभार व्यक्त किया। साथ ही बर्ड, होप, आदार फाउंडेशन, उद्योग विभाग बिहार सरकार, वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार, प्रशिक्षकों, समन्वयक और समिति के मंत्री राजकुमार केवट के सहयोग की सराहना की। कॉफेड ने इस पहल के माध्यम से जलाशयों की सफाई, अपशिष्ट के उपयोग और महिला सशक्तीकरण को स्वरोजगार से जोड़ने की प्रतिबद्धता जताई। समारोह में सिमरन, रवि राज, प्रमोद कुमार रजक, मोनव्वर अली, अमरेन्द्र झा, मोनू कुमार, गोपी कुमार, कंचनवाला, अमृतेश आनंद, सुप्रिया, भारती कुमार, स्वास्तिका राज, प्रकाश कुमार झा, रवि सहनी और चंदन कुमार सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
