गांगेय डॉल्फिन संरक्षण, अनुसंधान, शिक्षा और मछुआरा सहभागिता के लिए दीर्घकालिक कार्ययोजना पर जोर
पटना। बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ लि० (कॉफ्फेड) के मुख्यालय में आज ’’राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस’’ मनाया गया। इस अवसर पर भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव ’’गांगेय डॉल्फिन’’ के संरक्षण, उसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, जन-जागरूकता, मछुआरा सहभागिता तथा डॉल्फिन संरक्षण से संबंधित संस्थागत ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में बताया गया कि कॉफ्फेड लंबे समय से गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण से जुड़े विभिन्न विषयों को राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहा है’’। संघ का मानना है कि डॉल्फिन संरक्षण को केवल वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम के रूप में न देखकर नदी पारिस्थितिकी, परंपरागत मत्स्यजीवियों की आजीविका, वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा, पर्यटन एवं नदी परिवहन से जोड़कर एक समग्र नीति के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर कॉफ्फेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने कहा कि गांगेय डॉल्फिन की उपस्थिति किसी भी नदी के बेहतर पारिस्थितिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेत है। गंगा सहित बिहार की प्रमुख नदियों में डॉल्फिन के प्राकृतिक आवास की रक्षा के लिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों, मत्स्यजीवी सहकारी समितियों, पारंपरिक मछुआरों, शिक्षण संस्थानों तथा स्थानीय समुदायों के बीच स्थायी समन्वय स्थापित किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कॉफ्फेड इस दिशा में वर्षों से विभिन्न स्तरों पर पत्राचार, जागरूकता और नीतिगत पहल करता रहा है और आगे भी राष्ट्रीय जलीय जीव के संरक्षण के लिए सक्रिय भूमिका निभाएगा। डॉल्फिन संरक्षण के लिए कॉफ्फेड द्वारा उठाए जा रहे प्रमुख विषय कॉफ्फेड द्वारा गांगेय डॉल्फिन संरक्षण एवं अनुसंधान के संबंध में कई महत्वपूर्ण विषय लंबे समय से संबंधित विभागों एवं संस्थानों के समक्ष उठाए जाते रहे हैं।
विक्रमशिला जैव विविधता शोध एवं शिक्षा परियोजना: भागलपुर क्षेत्र में डॉल्फिन एवं गंगा की जैव विविधता को केंद्र में रखते हुए एक सुदृढ़ ‘‘डॉल्फिन कंजर्वेशन प्रोजेक्ट‘‘ तथा विक्रमशिला जैव विविधता शोध एवं शिक्षा व्यवस्था’’ विकसित किए जाने की आवश्यकता पर कॉफ्फेड द्वारा बल दिया गया है। राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र, पटना को मजबूत करना: पटना स्थित ’’राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र को देश में डॉल्फिन अनुसंधान, संरक्षण, प्रशिक्षण एवं नीति निर्माण के एक उत्कृष्ट राष्ट्रीय संस्थान के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बताई गई। कॉफ्फेड ने केंद्र के लिए पर्याप्त वित्तीय, तकनीकी एवं मानव संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र में नियमित निदेशक की नियुक्ति: राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र, पटना में ‘‘रेगुलर डाईरेक्टर‘‘ की नियुक्ति कर संस्थान को पूर्ण रूप से क्रियाशील बनाने तथा अनुसंधान एवं संरक्षण कार्यक्रमों के लिए आवश्यक वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराने की मांग की गई। डॉल्फिन संग्रहालय की स्थापना: राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र, पटना में आधुनिक ’’डॉल्फिन संग्रहालय‘’ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जहां गांगेय डॉल्फिन की जैविक विशेषताओं, जीवनचक्र, नदी पारिस्थितिकी, संरक्षण इतिहास एवं वैज्ञानिक अनुसंधान से संबंधित सामग्री का प्रदर्शन किया जा सके।
संग्रहालय को विद्यार्थियों, शोधार्थियों, पर्यटकों एवं आम नागरिकों के लिए डॉल्फिन जागरूकता केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की आवश्यकता बताई गई। डॉल्फिन पुस्तकालय की स्थापना: राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र में एक विशेषीकृत ‘‘डॉल्फिन लाईब्रेरी‘‘ स्थापित करने की भी आवश्यकता व्यक्त की गई है, जिसमें देश-विदेश के शोधपत्र, पुस्तकें, वैज्ञानिक रिपोर्ट, संरक्षण संबंधी कानून, नदी पारिस्थितिकी तथा जलीय जैव विविधता से संबंधित सामग्री उपलब्ध हो। डॉल्फिन अध्ययन में स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम: कॉफ्फेड ने राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र अथवा संबंधित विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के सहयोग से ‘‘डॉल्फिन स्टडीज़, रिवर ईकोलोजी तथा एक्वेटिक बायोडाईवर्सिटी‘‘ से संबंधित स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किए जाने की आवश्यकता बताई है। इससे भविष्य में प्रशिक्षित शोधकर्ता, संरक्षण विशेषज्ञ एवं नदी पारिस्थितिकी विशेषज्ञ तैयार किए जा सकेंगे। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में डॉल्फिन संरक्षण:राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र द्वारा तैयार वैज्ञानिक एवं जागरूकता सामग्री को देश के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उपयुक्त स्तर पर शामिल करने की पहल किए जाने की आवश्यकता बताई गई। नई पीढ़ी में नदियों, जलीय जैव विविधता तथा राष्ट्रीय जलीय जीव के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना दीर्घकालीन संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भागलपुर के ’’सुल्तानगंज से बटेश्वर स्थान तक फैले डॉल्फिन अभयारण्य’’ क्षेत्र में आधुनिक ‘‘डॉल्फिन ऑबजर्वेटरी/डॉल्फिन भवन‘‘ की स्थापना की आवश्यकता पर कॉफ्फेड ने विशेष जोर दिया। यह केंद्र वैज्ञानिक अवलोकन, शोध, पर्यावरण शिक्षा, नियंत्रित इको-टूरिज्म तथा डॉल्फिन संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके माध्यम से स्थानीय मछुआरा समुदाय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए रोजगार एवं आजीविका के वैकल्पिक अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं। कॉफ्फेड का मानना है कि डॉल्फिन संरक्षण में सबसे प्रभावी भूमिका उन्हीं पारंपरिक मछुआरों की हो सकती है जो पीढ़ियों से नदियों को जानते और समझते हैं। इसलिए राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र, पटना तथा गंगा, गंडक, कोसी एवं अन्य डॉल्फिन क्षेत्रों में पारंपरिक मछुआरों को ’’“डॉल्फिन मित्र”’’ के रूप में नियुक्त करने हेतु पदों का सृजन किया जाना चाहिए। इन डॉल्फिन मित्रों को प्रशिक्षण देकर डॉल्फिन की गतिविधियों की जानकारी, घायल या संकटग्रस्त डॉल्फिन की सूचना, अवैध गतिविधियों की रिपोर्टिंग, वैज्ञानिक सर्वेक्षण में सहयोग तथा स्थानीय स्तर पर जन-जागरूकता जैसे कार्यों में शामिल किया जा सकता है। डॉल्फिन संरक्षण के लिए यदि किसी क्षेत्र में मत्स्याखेट पर प्रतिबंध या अन्य नियंत्रण लागू किए जाते हैं तो वहां के परंपरागत मछुआरा परिवारों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। कॉफ्फेड ने ऐसे मछुआरों के लिए ’’मुआवजा, वैकल्पिक आजीविका, प्रशिक्षण एवं विशेष सहायता योजना’’ लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
संरक्षण तभी टिकाऊ हो सकता है जब स्थानीय मछुआरा समुदाय संरक्षण कार्यक्रम का लाभार्थी एवं भागीदार दोनों बने। डॉल्फिन संरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए वाईल्ड लाईफ प्रोटेक्शन एक्ट के प्रासंगिक प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 33बी के संदर्भ में आवश्यक एडवाईज़री कमिटी गठित करने तथा इसमें वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों, संरक्षण विशेषज्ञों के साथ पारंपरिक मछुआरा प्रतिनिधियों एवं मत्स्यजीवी सहकारी संगठनों को प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता बताई गई। इससे संरक्षण नीति तैयार करते समय जमीनी अनुभवों को भी उचित स्थान मिल सकेगा। गंगा, गंडक, कोसी तथा अन्य डॉल्फिन वाली नदियों के प्रमुख घाटों, तटबंधों और नदी तटीय क्षेत्रों में ‘‘डॉल्फिन कंजर्वेशन एण्ड अवेयरनैश एण्ड अवेयरनैस बोर्ड‘‘ लगाने की पहल की जानी चाहिए। इन बोर्डों के माध्यम से डॉल्फिन की पहचान, संरक्षण संबंधी निर्देश, निषिद्ध गतिविधियां, आपातकालीन सूचना नंबर और नागरिकों की जिम्मेदारियों के संबंध में जानकारी प्रदर्शित की जा सकती है।
गंगा नदी में प्रस्तावित अथवा प्रारंभ होने वाली ‘‘वाटर मेट्रोसेवा’’ को लेकर भी कॉफ्फेड ने डॉल्फिन के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। कॉफ्फेड का सुझाव है कि ऐसे परिवहन प्रकल्पों के संचालन से पूर्व डॉल्फिन आवास क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए तथा जहाजों की गति, ध्वनि प्रदूषण, मार्ग निर्धारण और संवेदनशील क्षेत्रों में परिचालन से संबंधित स्पष्ट पर्यावरणीय प्रोटोकॉल तैयार किए जाए। जहां डॉल्फिन की अधिक उपस्थिति हो, वहां ‘‘स्पीड रेगुलेशन/नो हॉर्न/साईलेन्ट ज़ोन‘‘, निर्धारित नेविगेशन कोरिडोर तथा नियमित डॉल्फिन मोनिटरिंग‘‘ जैसी व्यवस्थाओं पर विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय जलीय जीव गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण के लिए मछुआरों, नाविकों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्थानीय समुदायों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए नियमित ’’प्रशिक्षण, डॉल्फिन पाठशाला एवं कार्यशालाओं’’ का आयोजन किए जाने की आवश्यकता बताई गई। कॉफ्फेड अपनी सहकारी संरचना एवं मछुआरा नेटवर्क के माध्यम से ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों में सक्रिय सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है।
कॉफ्फेड ने सुझाव दिया कि विश्व के उन देशों के सफल अनुभवों का भी अध्ययन किया जाए जहां डॉल्फिन एवं अन्य जलीय स्तनधारियों के संरक्षण के लिए समुदाय आधारित संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, इको-टूरिज्म और नदी परिवहन प्रबंधन के प्रभावी मॉडल विकसित किए गए हैं। भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयोगी अंतरराष्ट्रीय पद्धतियों को अपनाकर गांगेय डॉल्फिन संरक्षण कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। कार्यक्रम में कहा गया कि प्रत्येक वर्ष ’’5 अक्टूबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस’’ केवल औपचारिक आयोजन न होकर विद्यालयों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, पंचायतों, घाटों, मत्स्यजीवी सहकारी समितियों एवं नदी तटीय गांवों तक पहुंचने वाला व्यापक जन-जागरूकता अभियान बनना चाहिए। कॉफ्फेड द्वारा भविष्य में अपनी संबद्ध मत्स्यजीवी सहकारी समितियों एवं मछुआरा समुदायों के माध्यम से डॉल्फिन संरक्षण संबंधी जागरूकता को और व्यापक बनाने का प्रयास किया जाएगा।
प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने कहा कि “गांगेय डॉल्फिन हमारी राष्ट्रीय जलीय धरोहर है। डॉल्फिन को बचाने का अर्थ केवल एक जीव प्रजाति को बचाना नहीं है, बल्कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की पूरी जैव विविधता और पारिस्थितिकी की रक्षा करना है। इस संरक्षण प्रक्रिया में सदियों से नदियों के साथ जीवन बिताने वाले पारंपरिक मछुआरों को केंद्र में रखना होगा।” उन्होंने आगे कहा कि-“डॉल्फिन और मछुआरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों स्वस्थ नदी पारिस्थितिकी के अभिन्न अंग हैं। यदि मछुआरों को प्रशिक्षित कर उन्हें डॉल्फिन मित्र बनाया जाए तथा संरक्षण से प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा एवं वैकल्पिक आजीविका दी जाए तो बिहार पूरे देश के सामने समुदाय आधारित डॉल्फिन संरक्षण का एक सफल मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।” कॉफ्फेड ने राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस के अवसर पर केंद्र एवं राज्य सरकार, राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र, वन एवं पर्यावरण विभाग, मत्स्य विभाग, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय निकायों तथा मछुआरा समुदाय से समन्वित प्रयास कर गांगेय डॉल्फिन के दीर्घकालीन संरक्षण के लिए एक व्यापक ‘‘ डॉल्फिन कंजर्वेशन एण्ड कम्यूनिटी पार्टीशिपेशन एक्शन प्लान‘‘ तैयार करने का आह्वान किया। इस अवसर पर राजेन्द्र सहनी, गोताखोर, कॉफ्फेड के पदाधिकारीगण् सिमरन, रवि राज, प्रमोद कुमार रजक, अमरेन्द्र झा, मोनू कुमार, रानी सहनी, दयानंद कुमार, गोपी कुमार, कंचनवाला, अमृतेश आनंद, सुप्रिया, भारती कुमार, स्वास्तिका राज, रवि सहनी एवं कृष्णा कुमार।
